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समझ समझ रे जीवड़ा तेरा अवसर आया रे

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समझ समझ रे जीवड़ा,
तेरा अवसर आया रे।

दोहा – मानव जन्म अनमोल है,
इने मत कोई खोवो अजाण,
सत्संगत में आय के भायो,
करलो निज कल्याण।।

समझ समझ रे जीवड़ा,
तेरा अवसर आया रे,
शुभ रे करम तेरा उदै हुआ,
तब मानुष तन पाया,
समझ समझ म्हारा जीवड़ा।।

जन्म मरण दुःख जाळ में,
फिर फिर गोता खाया,
तीन खाणी रे अंध कूप हैं,
तामे कर्म फिराया,
समझ समझ म्हारा जीवड़ा।।

ऋषि मुनि और देवता,
अवतार कहवाया,
सिध्द रे साधक को वे अवलिया,
जिन मत पंथ चलाया,
समझ समझ म्हारा जीवड़ा।।

विद्या कला प्रगट करी,
मन्त्र यन्त्र बनाया,
मानुष से सब होत हैं,
यहीं से सब उपजाया,
समझ समझ म्हारा जीवड़ा।।

वो ही देह तुमको मिली,
अटे मिले गुरु राया,
बोध होवे रे अपने स्वरूप का,
सतगुरु कबीर समझाया,
समझ समझ रे जीवड़ा,
तेरा अवसर आया रे।।

दोहा – परखावे परखे सदा,
सत्संग के बीच,
तांको हमारी बन्दगी,
पछे किंचित रहे न कींच।

सब सिद्दांत कौन करिया जग में,
आदम मानुष तुम्ही तो हो,
ईश्वर खुदा जगत रा कर्ता,
कल्पना करने वाला तुम्ही तो हो।।

वेद शास्त्र विद्या कला आदि,
वाणी बनानें वाला तुम्ही तो हो,
कर्म उपासना योग ज्ञान आदि,
मार्ग चलाने वाला तुम्ही तो हो।।

खाणी बाणी स्त्री पुत्र धन आदि,
माया में फंसता तुम्ही तो हो,
विषय आनंद अध्याश छोड़ कर,
मुगत होने वाला तुम्ही तो हो।।

पारखी गुरु की खोज लगाके,
निज पारख पाया वो तुम्ही तो हो,
काशी कहे कहां तक कहिये,
सब जांणन वाला तुम्ही तो हो।।

सब सिद्दांत कौन करिया जग में,
आदम मानुष तुम्ही तो हो,
ईश्वर खुदा जगत रा कर्ता,
कल्पना करने वाला तुम्ही तो हो।।

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