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माटी के पुतले रे तेरा अपना यहाँ नहीं कोय भजन लिरिक्स

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गुरुदेव भजन माटी के पुतले रे तेरा अपना यहाँ नहीं कोय भजन लिरिक्स
तर्ज – पिंजरे के पंछी रे।

माटी के पुतले रे,
तेरा अपना यहाँ नहीं कोय,
तेरा अपना यहाँ नहीं कोय,
सतगुरु ने कितना समझाया,
अब काहे को रोए रे,
ऐ अब काहे को रोय,
तेरा अपना यहाँ नही कोय,
माटी के पुतले रे।।

भूखा प्यासा रह कर तू ने,
करदी न्योछावर,
ये जिन्दगानी रे,
जिसकी खातिर महल बनाया,
जिसकी खातिर महल बनाया,
वो ही न तेरा होय,
तेरा अपना यहाँ नही कोय,
माटी के पुतले रे।।

करले जो भी करना है तुझको,
समय सुहाना बिता जाए रे,
चला गया ये समय तो पगले,
चला गया ये समय तो पगले,
फिर वापस न होय,
तेरा अपना यहाँ नही कोय,
माटी के पुतले रे।।

खुद के लिए कुछ कर ले कमाई,
बीत रही तेरी जिन्दगानी रे,
कल कल में जीवन कई बीते,
कल कल में जीवन कई बीते,
कल न तेरा होय,
तेरा अपना यहाँ नही कोय,
माटी के पुतले रे।।

माटी के पुतले रे,
तेरा अपना यहाँ नहीं कोय,
तेरा अपना यहाँ नहीं कोय,
सतगुरु ने कितना समझाया,
अब काहे को रोए रे,
ऐ अब काहे को रोय,
तेरा अपना यहाँ नही कोय,
माटी के पुतले रे।।

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